Supreme Court: '2014 से पहले का मुआवजा न मिलने पर लागू होगा 2013 का कानून', सुप्रीम कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने जमीन अधिग्रहण मुआवजे से जुड़ी अपीलों पर एक महत्वपूर्ण फैसला दिया। कोर्ट ने कहा है कि अपीलों परिसीमा कानून से अपने-आप बाहर नहीं होतीं।

हाईकोर्ट ऐसी अपीलों में देरी को माफ कर सकता है। न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और न्यायमूर्ति एससी शर्मा की पीठ ने यह फैसला सुनाया। 2013 के जमीन अधिग्रहण कानून और 1963 के परिसीमा अधिनियम के संबंध पर विचार किया।

यह मामला पुराने और नए कानून के बीच तालमेल से जुड़ा था। कोर्ट ने कहा है कि जमीन अधिग्रहण मुआवजे के खिलाफ दायर अपीलों पर 2013 के कानून की धारा 24(1)(ए) लागू होगी।

इस धारा के तहत मुआवजा तय करने के लिए नए कानून के प्रावधान ही मान्य होंगे। हालांकि, पुनर्वास और पुनर्स्थापन से जुड़े लाभ अलग रहेंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पीड़ित पक्ष 2013 के कानून के तहत बने प्राधिकरण के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील कर सकते हैं। इन अपीलों को पहली अपील माना जाएगा।

शीर्ष कोर्ट ने कहा है कि हाईकोर्ट को ऐसे मामलों में व्यावहारिक नजरिया अपनाना चाहिए। बेहद सख्त रवैया नहीं अपनाया जाना चाहिए।
 
मुआवज़े पर अपील करना ज्यादा मुश्किल हो गया। लेकिन क्या यही सब सही है? 1963 के अधिनियम से पहले देश में इतने बड़े-बड़े फैसले लेने की कैसे संभावना थी।
 
मुझे बहुत दुख हुआ जब नियमितता की बात आयी। लोगों को मुआवजा नहीं मिलना चाहता तो इसके लिए क्या कानून बनाएं? पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला सुनकर खुशी हुई। यह सुनकर लगता है कि कुछ में भी सुधार की दिशा है।
 
ज़रूरी यह फैसला आ गया, लेकिन क्या हाईकोर्ट ने वास्तव में समझा कि जमीन अधिग्रहण मामलों में बेझिझक देरी हो सकती है? कभी-कभी पीड़ित पक्ष को जल्द से जल्द निर्णय मिलना चाहिए, ताकि उनकी जिंदगी में कोई बदलाव न आ सके। परन्तु फैसला अच्छा है, लेकिन हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उच्चतम न्यायालय के फैसलों को भी समय से पहले सुनिश्चित करना चाहिए।
 
मैंने बहुत से लोगों को देखा है जिनकी जमीन छीनी गई और वे मुआवजे के लिए लड़ रहे थे। तो जब यह फैसला आया कि अपीलों परिसीमा कानून से बाहर नहीं होती, तो मेरा मन भी खुश हुआ।
लेकिन इस फैसले से पहले, मैंने सोचा था कि क्या आगे कोई हल निकलेगा। और अब जब यह फैसला आया, तो मुझे लगा कि सब कुछ ठीक हो गया है। लेकिन कुछ ऐसी बातें भी सोच रहा हूं कि आगे क्या होगा।
मुझे लगता है कि इस फैसले से जमीन अधिग्रहण मुआवजे में सुधार हो सकता है। लेकिन अभी भी बहुत से मामले रहेंगे जिनकी हल निकलेगी।
 
🤔 यह फैसला नीचे मौजूद व्यवस्था को समझने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। 2013 के जमीन अधिग्रहण कानून और 1963 के परिसीमा अधिनियम के बीच तालमेल से जुड़े यह मामले में न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और न्यायमूर्ति एससी शर्मा की पीठ ने इस बात को साफ कर दिया है कि जमीन अधिग्रहण मुआवजे के खिलाफ दायर अपीलों पर 2013 के कानून की धारा 24(1)(ए) लागू होगी। यह तय होता है कि पीड़ित पक्ष इस कानून के तहत बने प्राधिकरण के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील कर सकते हैं।

जमीन अधिग्रहण मुआवजे पर मामलों में व्यावहारिक नजरिया अपनानी चाहिए। बेहद सख्त रवैया नहीं अपनाया जाना चाहिए। इस तरह की घटनाओं को समझने और निपटने के लिए हमें एक अच्छी व्यवस्था की जरूरत है।
 
अरे, यह तो समझ आता है कि जमीन अधिग्रहण मुआवजे की बात कर रहे हैं। लेकिन कोर्ट ने फैसला दिया कि अपीलों परिसीमा कानून से अपने-आप बाहर नहीं होती। मतलब, अगर पीड़ित पक्ष खुश नहीं हैं, तो वे 2013 के कानून के तहत बने प्राधिकरण के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील कर सकते हैं। यह तो समझ में आता है, लेकिन मुझे लगता है कि कोर्ट ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि नए और पुराने कानून के बीच तालमेल से जुड़े हुए यह मामले को कैसे हल किया जाए।
 
मैंने जब भी जमीन अधिग्रहण के मामले में अपीलों को देखा है, तो मुझे लगता है कि यह बहुत जटिल होता है। क्या ये न्यायालय हमेशा सही सोचते हैं? मैंने अपने दादाजी को बताया था, वे कहते थे "न्यायालय में इतनी बातें होती हैं, लेकिन अंत में यह तय होता है कि जमीन किसका है।" 😐

मैंने अपने बच्चों को भी बताया है, वे कहते हैं "पिताजी, ये तो बस नियमों का उल्लंघन है, लेकिन जीवन में यह सीखना कि जब बातें होती हैं, तो हमेशा सही निर्णय लेना, वास्तव में चुनौतीपूर्ण है।"

मुझे लगता है कि ऐसे मामलों में सख्त निर्देशित रहना भी महत्वपूर्ण है, ताकि न्यायालय किसी भी तरह की भूल न करे। लेकिन मुझे लगता है कि यह फैसला सही है, क्योंकि इससे जमीन अधिग्रहण के मामलों में समानता मिलेगी।
 
मैंने देखा कि जमीन अधिग्रहण मुआवजे पर तो खेद है लेकिन इन अपीलों को देखने से मुझे एहसास होता है की हमारे देश की न्यायपालिका बहुत ही सक्षम है। 🙏
मैंने देखा कि परिसीमा अधिनियम और जमीन अधिग्रहण कानून में तो अंतर है लेकिन जो फैसला सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया है वह बिल्कुल सही है। 🤝
क्या हमारे पास देश में युवाओं को रोजगार के अवसर देने का समय नहीं आया? जैसे जमीन अधिग्रहण मुआवजे को संवेदनशीलता से देखना चाहिए। 🤔
 
मुझे लगता है कि जमीन अधिग्रहण मुआवजे की सीमाएं तय करने वाले कानूनों में थोड़ी सी अनियमितता देखी जा सकती है। 2013 के कानून में मुआवजा तय करने के लिए नए कानून के प्रावधानों को मानने की जरूरत है, लेकिन पुराने कानून से अलग-अलग फायदे भी देने चाहिए। 🤔

इसके अलावा, पीड़ित पक्ष को हाईकोर्ट में अपील करने का अधिकार होना चाहिए, लेकिन यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि उनकी अपील व्यावहारिक और न्यायसंगत हो। 📝

अगर हम पुराने और नए कानूनों के बीच तालमेल नहीं बना पाते, तो यह सुप्रीम कोर्ट के फैसले में एक कमजोरी दिखाई देगी। 💔
 
अर्थ निर्णय की गहराई में, मनोभूमि में ले जाते हैं हमारे विचार 🤔। भ्रष्टाचार से बचने के लिए यह फैसला है एक बड़ा पलटाव, इसीलिए सभी दायित्वों को समझ कर आगे बढ़ें।
 
मैंने पढ़ा है सुप्रीम कोर्ट ने जमीन अधिग्रहण मुआवजे पर अपीलों पर फैसला दिया, यह तो बहुत बड़ी खबर है 🤩। मुझे लगा जैसे ही मेरी दिल्ली के अपने डेयरी फार्म से निकलने वाले गायों की मदद कर रहा है। यानी, जमीन अधिग्रहण मुआवजे पर न्याय होगा, यह तो एक अच्छी बात है 🐮💖
 
मुझे लगता है कि यह फैसला हमेश के लिए बदलेगा | क्योंकि अब जमीन अधिग्रहण में लोगों को पूरी सुरक्षा मिलेगी और वे अपने-आप बिना किसी परेशानी के अपनी जमीन की खातर होंगे। मुझे यकीन है कि यह फैसला हमारे देश के लिए बहुत फायदेमंद होगा। मैं सोचता हूं कि पीड़ित पक्ष वास्तव में अपने अधिकारों की रक्षा कर सकेंगे।
 
मुझे लगता है कि यह फैसला बहुत अच्छा है। 2013 के जमीन अधिग्रहण कानून और 1963 के परिसीमा अधिनियम को तालमेल देने में सुप्रीम कोर्ट ने बहुत सावधानी बरती। यह फैसला जमीन अधिग्रहण मुआवजे के मामलों में निश्चितता लाता है और पीड़ित पक्ष को अपने अधिकारों की रक्षा करने में मदद करता है।
 
अगर जमीन अधिग्रहण कानून से जुड़ी अपीलों पर बहुत सख्त रवैया लागू हुआ तो यह बिल्कुल सही नहीं होगा। यह फैसला न केवल पीड़ित पक्ष के हक में है, बल्कि यह भी व्यवस्थित और अनुशासित तरीके से काम करने की जरूरत है।
 
यह फैसला बहुत जरूरी है, लेकिन अभी भी कुछ सवाल हैं ... क्या जमीन अधिग्रहण मुआवजे में पीड़ित पक्ष को प्राधिकरण द्वारा स्वीकृति मिलेगी? और फिर वह कैसे विभिन्न लाभों का मामला करेगा जैसे पुनर्वास और पुनर्स्थापन?

मुझे लगता है कि यह फैसला जमीन अधिग्रहण मुआवजे से जुड़े मामलों में न्यायिक तालमेल को सुधारने में मदद करेगा। लेकिन हमें अपनी भी बात रखनी होगी, ताकि पीड़ित पक्ष को उचित लाभ मिल सके।
 
अरे, यह फैसला लोगों के लिए बहुत ही दुखद है 🤕। जमीन अधिग्रहण मुआवजे की बात करें तो कई लोगों को अब अपने जीवन को नया बनाने के लिए पैसे नहीं मिल रहे हैं। यह सोचकर भारी है। सरकार और न्यायपालिका दोनों ही लोगों की मदद करनी चाहिए। कोर्ट ने कहा है कि अपीलों परिसीमा कानून से अपने-आप बाहर नहीं होती, लेकिन यह तो समझ में नहीं आ रहा। अगर पीड़ित पक्ष 2013 के कानून के तहत बने प्राधिकरण के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील कर सकते हैं तो यह एक अच्छा संकेत है। लेकिन अगर न्यायपालिका का रवैया भारी है तो लोगों को नहीं मदद मिलेगी।
 
आपको पता है कि जमीन अधिग्रहण मुआवजे में बहुत लोगों की बात होती रहती है। लेकिन कभी-कभी हमें समझना भी जरूरी है कि सरकार कितनी मुश्किल में पड़ जाती है जब वह इतने सारे लोगों को मुआवजा देने की बात करती है।

उसके अलावा, यह फैसला हमेशा से चल रहे जमीन अधिग्रहण मामलों की एक नई दिशा खोलेगा। जो लोग पहले से कह रहे थे कि सरकार को बिना किसी मुआवजे जमीन लेनी चाहिए, अब उन्हें यह समझना पड़ेगा कि सरकार तो उसके देश की आर्थिक विकास के लिए कुछ भी करने को तैयार है।
 
मुझे लगता है कि यह फैसला जमीन अधिग्रहण मुआवजे की बात कर रहा है, लेकिन सच्चाई यह है कि ये मामला बहुत जटिल है। मैं समझता हूँ कि पीड़ित पक्षों ने अपने-अपने तर्क दिए हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का फैसला तो एक नए दिशानिर्देश की ओर ले गया है 🔄

जैसे कि मैंने पहले भी कहा था, जमीन अधिग्रहण में मुआवजे की बात करना आसान है, लेकिन उसके पीछे की जटिलताएं दूर से देखी नहीं जा सकतीं। यह फैसला मुझे एक नई दिशा में ले गया है और मैं अब इसके परिणामों को देखने के लिए उत्सुक हूँ 🤔

क्या यह फैसला जमीन अधिग्रहण मुआवजे की नई दिशा साफ करेगा या इससे और जटिलताएं निकलेंगी, यह समय के साथ पता चलेगा। लेकिन एक बात तो सुनिश्चित है, यह फैसला हमें जमीन अधिग्रहण में बदलाव लाने की दिशा में आगे बढ़ाएगा 🔄
 
ज़रूरी है कि हाईकोर्ट में देरी न मिले। तो जमीन अधिग्रहण में लोगों के पैसे खर्च न करें। इस फैसले से लोगों का मनोबल बढ़ेगा।
 
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