संसद में साजिश: पीएम मोदी को सदन न आने की सलाह क्यों? सुरक्षा को लेकर स्पीकर की चिंता जायज; कटघरे में विपक्ष

संसद में हंगामे की साजिश: पीएम मोदी को सदन न आने की सलाह देना?

बीते बुधवार को लोकसभा में सदन की कार्यवाही शुरू होते ही, तब हालात तेजी से बिगड़ गए थे। विपक्षी सांसदों ने सदनीय मर्यादाओं की अनदेखी करते हुए वेल ऑफ द हाउस में प्रवेश किया। कई महिला सांसद प्रधानमंत्री की सीट की ओर आक्रामक तरीके से बढ़ीं, जिससे एक तरह का घेरा बन गया। इससे सदन में असुरक्षा और अव्यवस्था की स्थिति और गंभीर हो गई।

स्पीकर ओम बिरला ने इस अराजकता को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सदन में न आने की सलाह दी। यह निर्णय केवल प्रधानमंत्री की सुरक्षा, सदन में व्यवस्था बनाए रखने और संसदीय गरिमा की रक्षा के उद्देश्य से लिया गया था।

विपक्ष ने इस दावे को तथ्यहीन बताया है कि सरकार के दबाव में स्पीकर ने सदन में आक्रामकता बढ़ाने की सलाह दी। उनका कहना है कि विपक्ष का यह आरोप तथ्यों से परे है, और सदन में उस दिन जो घटनाएं हुईं, वे खुद स्थिति की गंभीरता को दर्शाती हैं।

सप्ताहांत लोकसभा में लगातार हंगामा होने पर संसदीय कार्यवाही ठप हो गई। कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने आरोप लगाया कि सरकार संसद को बेअसर बनाने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि सदन चलाना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन अगर सरकार जिद पर अड़ी रहे, तो कुछ नहीं किया जा सकता।

इस हंगामे के बाद संसद में सत्र शुरू होने पर विपक्ष ने अपनी बहिष्कार नीति को जारी रखा, जबकि सरकार ने सदन चलाने के लिए मजबूत कदम उठाए।
 
मैं समझता हूँ कि सदन में हंगामे का मामला अच्छी तरह से नहीं प्रबंधित हुआ, लेकिन हमें इसके पीछे की वजह जानने की जरूरत है। क्या यह सच है कि सरकार ने विपक्षी दलों को दबाने के लिए इस्त्री अपनाई? क्या स्पीकर ओम बिरला ने सरकार के दबाव में यह निर्णय लिया था? मुझे लगता है कि इसके पीछे एक ठोस सबूत चाहिए।
 
🤔 संसद में ऐसा हंगामा तो कभी नहीं देखा गया। पीएम नरेंद्र मोदी को सदन में आने की सलाह देना? यह कोई बड़ी बात नहीं है। लेकिन इस बार विपक्षी सांसदों ने सदनीय मर्यादाओं को तोड़ दिया। महिलाएं प्रधानमंत्री की सीट पर आक्रामक तरीके से बढ़ गए, यह बहुत ही गंभीर मुद्दा है।

बड़े बड़े नेता ऐसे व्यवहार करते समय तो मुझे लगता है कि उनके पास अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए कोई तर्क नहीं है। इसकी वजह से सदन में असुरक्षा और अव्यवस्था पैदा हो गई।

लेकिन फिर भी, यह सवाल उठता है कि क्यों विपक्ष ने इस बार अपनी बहिष्कार नीति को जारी रखा। क्या सरकार ने पर्याप्त तरीके से सदन में स्थिति को सुधारने की कोशिश नहीं की।
 
ज़रूर, यह देखकर तो मुझे लगता है कि सरकार और विपक्ष दोनों ही अपनी-अपनी राजनीति कर रहे हैं। लेकिन इस तरह से सदन में असुरक्षा बनाई गई तो कुछ नहीं होगा। यह जरूरी है कि प्रधानमंत्री और स्पीकर की सुरक्षा पर ध्यान दिया जाए, लेकिन इससे सदन की गरिमा को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए। 🤔
 
🤔 बीते दिनों का यह हंगामा तो मुझे खुशी से नहीं आया। सदन में ऐसी बातें करना वैसे भी अच्छी नहीं है, लेकिन जब महिलाएं प्रधानमंत्री की सीट पर आक्रामक तरीके से बढ़ जाती हैं, तो यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण लगता है। सदन में ऐसी अराजकता की जगह थोड़ी व्यवस्था और सम्मान की जरूरत है।

जैसे ही प्रधानमंत्री को सदन में आने से बचने की सलाह दी गई, यह तो एक बड़ा फैसला है। लेकिन अब सबके बादल खत्म करने की जरूरत है, और सदन चलाने के लिए सरकार को मजबूत और सम्मानजनक तरीके से काम करना चाहिए।

सदन में ऐसी घटनाएं होने पर नियमितता और व्यवस्था की जरूरत है। हमें सदन में सभी सदस्यों की भावनाओं का सम्मान करना चाहिए और उनकी आवाज़ सुननी चाहिए।
 
भाई, इस बात में तो संदेह ही है, कि विपक्ष का यह आरोप सच्चा है या नहीं... लेकिन मैं समझता हूँ कि स्पीकर की सलाह से पीएम मोदी ने सदन में आने से इनकार कर दिया, तो फिर यह कैसे संभव हुआ? क्या विपक्षी सांसदों ने खुद ही सदनीय मर्यादाओं को तोड़ दिया था... और मनीष तिवारी जी का कहना है कि सरकार संसद को बेअसर बनाने की कोशिश कर रही है, लेकिन यह भी तो बहुत बड़ा आरोप है... मुझे लगता है कि सदन में असुरक्षा और अव्यवस्था की स्थिति तो जरूर थी, लेकिन इसके पीछे क्या सच्चाई है? 🤔👀
 
मुझे लगता है कि संसद में ऐसा हंगामा तो होना दुर्भाग्यपूर्ण है 🤕। स्पीकर ओम बिरला ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सदन में आने नहीं देने की सलाह देना एक बड़ा कदम है, लेकिन इसका क्या मतलब है? क्या वास्तव में विपक्ष ने सदनीय मर्यादाओं को तोड़ दिया है? 🤔

मुझे लगता है कि यह एक बड़ा सवाल है, कि क्यों इतनी आक्रामकता से सदन में प्रवेश किया गया, और इससे कैसे सदन की गरिमा को नुकसान पहुंचाया गया। अगर विपक्षी सांसद अपने अधिकारों का उपयोग नहीं कर रहे थे, तो फिर वे इतने आक्रामक हो गए? 🤷‍♂️

लेकिन एक बात तो साफ़ है कि सदन में असुरक्षा और अव्यवस्था की स्थिति गंभीर हो गई, जिससे संसदीय गरिमा को खतरा लगा। इस पर सरकार ने मजबूत कदम उठाए हैं, लेकिन विपक्ष ने बहिष्कार नीति को जारी रखा है। 🤝
 
मुझे ये देखकर हैरानी हुई, सदन में ऐसा आराजकता तो कभी नहीं होता। पीएम मोदी को सदन आने से पहले सलाह देना है? यह तो कुछ और है। सरकार और विपक्ष दोनों ही अपने दावे बताते हुए बैठे हैं। लेकिन इस बीच सदन में कौन सी गरिमा बची है?

मुझे लगता है कि सदन चलाना एक जिम्मेदारी है, और अगर सरकार जिद पर अड़ी रहे, तो विपक्ष भी अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर सकता। लेकिन इस तरह के हंगामे में तो कुछ न कुछ हुआ होगा, या फिर यह सब सिर्फ मीडिया का हाथ है?

मुझे लगता है कि सदन में व्यवस्था बनाए रखने के लिए हमें एक-दूसरे की बात सुननी चाहिए, और अगर किसी को भी ऐसी सलाह देनी पड़ी, तो यह एक औचित्यक निर्णय होना चाहिए। 🤔
 
संसद में ऐसा हंगामा तो पहले से ही होना चाहिए, यही राजनीति की प्रकृति है 🤔। लेकिन जैसे ही सदनीय मर्यादाओं की अनदेखी होने लगी, सभी में डराने वाली भावना फैल गई। स्पीकर ने ऐसी सलाह देनी चाहिए थी, तभी हमारा सदन और भी असुरक्षित हो गया। सरकार को यह सुननी चाहिए कि सदन चलाना उसकी जिम्मेदारी है, लेकिन अगर वह जिद पर अड़ी रहे, तो कुछ नहीं कर सकता।
 
ਹंगामੇ ਦੀ ਮੁਸ਼ਕਲ ਭਾਰਤੀ ਰਾਜਨੀਤੀ ਵਿੱਚ ਸਦੀਆਂ ਪੁਰਾਣੀ ਹੈ, ਸਗੋਂ ਇਹ ਹੁਣ ਦੀ ਮੁਸ਼ਕਲ ਵਜੋਂ ਦਿਖਾਈ ਦੇ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਪ੍ਰਧਾਨ ਮੰਤ्रੀ ਦੀ ਸੁਰੱਖਿਆ ਅਤੇ ਸੰਸਦ ਵਿੱਚ ਕਾਰਜਕਾਰੀ ਲਈ ਮਹੱਤਵਪੂਰਨ ਹੈ।
 
संसद में ऐसा हंगामा तो कभी नहीं सोचा। प्रधानमंत्री की सुरक्षा और व्यवस्था के बीच यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण है। लेकिन इसके साथ-साथ सदनीय गरिमा भी बनी हुई है। मुझे लगता है कि स्पीकर ने सही फैसला लिया। अगर सरकार और विपक्ष दोनों एक-दूसरे के साथ समझौता करें, तो सदन में बहुत सारी समस्याएं हल हो जातीं। 🤔
 
माफ़ करना, ये दुनिया कितनी अजीब है 🤔। प्रधानमंत्री की सुरक्षा और सदन में व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से निर्णय लेना तो ठीक है, लेकिन विपक्ष का आरोप तथ्यों से परे है। क्या हमारे देश में अभी भी ऐसा समय नहीं आया था? सदन में जो घेराव बन गया, वह एक बड़ा सवाल उठाता है... 🤷
 
बात बात, यह सब सच नहीं हो सकता क्या? स्पीकर ओम बिरला जी को सदन में आने की सलाह देना तो फिर भी कुछ गलत हुआ था। लेकिन सरकार के दबाव में इस तरह की सलाह देना? नहीं लगता। विपक्षी सांसदों ने जो महिलाओं से लड़ाई की, वह सच्चाई पर आधारित है। और विपक्ष का आरोप सरकार के दबाव में इस तरह की सलाह देने का, तो भी ठीक है क्योंकि यह तथ्यहीन है। 😐
 
बिल्कुल ऐसा लगता है कि सदन में हंगामे ने बिल्कुल भी संसदीय सम्मान को ध्यान में नहीं रखा। 🤔 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सुरक्षा और सदन की व्यवस्था पर दृष्टि रखने का स्पीकर ओम बिरला का निर्णय, सरकार के दबाव में नहीं हुआ। सरकार जैसे ही सदन को बेअसर बनाने की कोशिश कर रही है तो इसके लिए उन्हें खुद संसदीय मर्यादाओं का पालन करना चाहिए।

विपक्षी सांसदों का सदन में वेल ऑफ द हाउस में आक्रामक तरीके से बढ़ना, यह तो न केवल अंग्रेजी राजनीति की शैली, बल्कि महिलाओं के प्रति भी अपमानजनक था। लेकिन सरकार को यह आरोप लगाते हुए कहा जा रहा है कि विपक्ष ने सदन में आक्रामकता बढ़ाने की सलाह दी, तो यह बिल्कुल सही नहीं है। 🚫

सप्ताहांत लोकसभा में लगातार हंगामा होने पर संसदीय कार्यवाही ठप हो गई, और कोई भी पार्टी दूसरे की बहिष्कार नीति को नहीं तोड़ पाया। यह न केवल सदन की व्यवस्था को देखने में समस्या है, बल्कि राजनीतिक संस्कृति को भी धमकाने वाला है। 🚨
 
मैंने भी इस तरह का हंगामा देखा है और मुझे लगता है कि यह कांग्रेस सांसदों ने बिल्कुल जरूरी नहीं किया था। वे सदन में घूम-घूम कर रहे थे, लेकिन कोई योजना या उद्देश्य नहीं था। और फिर उन्होंने कहा कि सरकार संसद को बेअसर बनाने की कोशिश कर रही है, लेकिन यह तो उनकी अपनी गलती का मौका देना था। अब सदन चलाना आसान नहीं होता, और सरकार को बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।

क्या कभी विपक्षी सांसदों ने यह सोचा होगा कि उनकी गतिविधियों से कितना परेशानी प्रधानमंत्री और अन्य सांसदों को होती है? मैं समझता हूं कि विपक्ष की जिम्मेदारी भी है, लेकिन कभी-कभी वे अपनी राजनीतिक रणनीतियों पर ध्यान देते हुए सदन की मर्यादाओं और नियमों को भूल जाते हैं।
 
बड़े बुरे दिन आ गए हैं 🤯 सदन में वेल ऑफ द हाउस पर महिला सांसदों की आक्रामकता ने एक तरह का घेरा बना दिया है। पीएम मोदी को सदन में आने की सलाह देना पड़ी तो! 🤦‍♂️ अब यह सवाल उठता है कि क्या संसदीय गरिमा और सदन की व्यवस्था बचने के लिए बिना तर्क के निर्णय लिए जाएंगे।
 
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