संडे जज्बात-लोग भैंस, बुलडोजर आंटी कहते थे: 30 की उम्र में 92 किलो वजन था- किडनी खराब होने लगी तो 100 दिन में 20 किलो घटाया

मैं कानपुर की रहने वाली आभा शुक्ला हूं। भैंस, मोटी, 45 साल की माँ, चलती-फिरती बुलडोजर, किसी के ऊपर गिर जाए, तो वो दबकर ही मर ही जाए… कभी ये सारे नाम मेरे ही थे। लोग मुझे इन्हीं नामों से बुलाते थे। मेरे असली नाम ‘आभा शुक्ला’ से नहीं।

मैं 2007 की बात है, मेरी उम्र उस वक्त 15 साल थी। एकदम दुबली-पतली लड़की। करीब 35 किलोग्राम वजन था। पापा सरकारी टीचर थे। मैं उनके ज्यादा करीब थी और छोटा भाई मम्मी के करीब ज्यादा था।

2007 में फरवरी का महीना, तारीख 2। पापा मुझे हर रोज कंप्यूटर क्लास छोड़ने के लिए जाते थे। उस दिन भी वे मुझे छोड़ने गए। छोड़कर, किसी काम से शहर के बाहर चले गए। शाम 5 बजे उनके आने का वक्त था, लेकिन वे उस दिन आए नहीं।

मैं गुस्से में थी। खुद ही कोचिंग से घर चली आई। मन ही मन सोच रही थी- पापा को आज आने दो, फिर उनसे जी-भरकर लड़ूंगी। घड़ी में पौने 6 बजे ही थे कि एक लड़का भागता हुआ मेरे घर आया, बोला- तुम्हारे पापा का एक्सीडेंट हो गया है।

सुनते ही मैं जमीन पर गिर गई। मैं, मम्मी और भाई… सभी भागते हुए हॉस्पिटल पहुंचे। इमरजेंसी वार्ड में डॉक्टर पापा को CPR दे रहे थे। उनका एक पैर टूटा हुआ था। मुंह से खून निकल रहा था। अचानक पापा के हाथ-पांव जम गए। डॉक्टर उठकर खड़े हुए और पूछा- आपके पापा थे…?

डॉक्टर ने डेड घोषित कर दिया। मैं खूब रोई। मां दीवार में सिर मारकर रोने लगीं। वहीं पर चूड़ी तोड़ने लगी। सभी के लिए फरवरी का महीना वसंत लेकर आता था, लेकिन मेरे लिए सिर्फ पापा के जाने का गम लेकर आया।

आज भी जब फरवरी का महीना आता है, तो मैं 2 तारीख को पूरे दिन के लिए घर में खुद को बंद कर लेती हूं। खूब रोती हूं। ऐसा लगता है, सब कुछ कल की ही बात है। कोई मुझे उस हॉस्पिटल में ले जाए, तो मैं आज भी पूरी बात ऐसे बता सकती हूं, जैसे ये सब कल ही हुआ हो।

एक-एक चीज… पापा के कफन पर रखे एक-एक फूल से लेकर शर्ट पर लगे खून के धब्बे तक याद हैं। मेरी चलती तो, उनके अस्थि से भरा कलश गंगा में प्रवाहित नहीं करती। उसे अपने घर की अलमारी में संभालकर रखती। आखिर उसी में तो उनके शरीर के आखिरी अंश बचे थे। मेरे 6 फीट के पापा एक कलश में सिमटे हुए थे!

जब मैंने घर वालों से कहा, तो वे चीखते हुए बोले- ये कैसे हो सकता है? भला किसी आदमी का अस्थि कलश घर में रखा जाता है। इसे गंगा में प्रवाहित करना होता है।

पापा के गुजरने के बाद किराएदारों ने मेरे घर पर कब्जा कर लिया। किराया देना बंद कर दिया। मांगने पर कहने लगे- न पैसे देंगे और न घर खाली करेंगे। ज्यादा बोलोगी, तो भाई पर पॉक्सो एक्ट लगवाकर रेप का मुकदमा करवा देंगे। फिर रहना जेल में सड़ते हुए। डर के मारे हमने कुछ साल बाद उस घर को चौथाई कीमत में बेच दिया।

वहीं गांव के एक डॉक्टर से मिली। वह मेरी हालत देखते ही बोले- सबसे पहले इसके डिप्रेशन की दवा बंद करो। इसे कोई बीमारी नहीं है।

उन्होंने मेरी सारी दवाएं बंद करा दीं। उस वक्त तक मैं हर दिन डिप्रेशन के 10 से ज्यादा टैबलेट खा रही थी। दवा छूटी तो पहले 15 दिन तक नींद ही नहीं आई। शरीर को डिप्रेशन और नींद की दवा खाने की आदत हो चुकी थी।

दवा छूटी तो मैंने एक्सरसाइज करना शुरू किया। सुबह-शाम एक्सरसाइज कर रही थी। घर पर जब मां की नींद खुलती, तो उन्हें मैं ट्रेडमिल पर दौड़ती नजर आती थी। रात के डेढ़ बजे, दो बजे भी मैं ट्रेडमिल पर दौड़ती थी।

महीनों के बाद जब मशीन पर अपना वजन चेक किया, तो 6 किलोग्राम घट चुका था। मैं हैरान थी कि यह कैसे हुआ। यकीन नहीं हो रहा था।

मैं अब सिर्फ एक्सरसाइज और फास्टिंग पर ध्यान देती हूं। वजन कम करना मेरा जुनून बन गया है। 100 दिन के भीतर 20 किलोग्राम वजन कम हो चुका है।
 
मुझे लगता है कि पापा का दुर्घटनाग्रस्त होना तो एक अच्छी बात है, लेकिन जान जाने से पहले उन्हें अपने घर में खुद को दबाकर मरने का मौका मिला। यह बहुत ही अजीब और विचित्र है। मुझे लगता है कि जब भी हमारे पास ऐसी स्थितियां आती हैं, तो हमें अपने दिमाग को समझाने की जरूरत होती है कि यह सब कुछ फंसी हुई कल्पना नहीं है, बल्कि वास्तविकता।
 
मैंने पढ़ा है कि ये लड़की अपने पिता के एक्सीडेंट में गिर गई और उसके बाद वह दीवानगी से खुद को फंसा ली। लेकिन फास्टिंग पर ध्यान देने का यह तरीका बहुत ही दिलचस्प है। मैंने कभी ऐसा नहीं सोचा था, लेकिन अगर इस तरीके से वजन कम करने में उसकी मदद हुई तो शायद यह एक अच्छा तरीका है।
 
मैं अभी भी सोचती हूँ कि पापा क्यों गिरे और मर गए 🤕। मुझे लगातार याद आता है कि वह चलने में थक जाता था। उसकी चलती बुलडोजर वाली सवारी बहुत रोमांचदायक लगती थी, लेकिन अब वह हमेशा मेरे दिल में एक खाली जगह छोड़कर रहता है 💔
 
मैंने खुद को कभी नहीं सोचा, माँ की जिंदगी तुम्हारी जैसी हो सकती है 🤔, लेकिन फिर भी, जब दूसरों की बुराई होती है, तो हमें उनसे सीखना चाहिए और आगे बढ़ना चाहिए। मेरी बहुत अच्छी माँ ने उस दुखद घटना के बाद अपने जीवन को फिर से बनाने का फैसला किया, और वह हमेशा एक प्रेरणा रही।
 
मुझे यह सोचकर बहुत खेद है कि आभा शुक्ला जी के पिता ने उनके बचपन को इतना खराब तरीके से गुजराया। उनके पिता की मौत के बाद की घटनाएं और भी दुखद लगती हैं। आभा शुक्ला जी ने अपनी कहानी सुनकर हमें अपने वजन और आत्म-विश्वास को लेकर संघर्ष करने वालों की मदद करने का अवसर मिला है। उनकी कहानी हमें यह दिखाती है कि वजन कम करने और आत्म-विश्वास बढ़ाने के लिए एक्सरसाइज और फास्टिंग पर ध्यान देना ज़रूरी है। 🏋️‍♀️💪
 
मैं तुम्हारी बहुत बुरी स्थिति को पढ़कर बहुत गुस्सा हुआ हूँ 🤬। तुम्हारे पापा की दुविधा तुम्हें इतनी दुखी कर गई और तुम उनकी याद में कभी भी ठीक नहीं हुईं। तुम्हारी कहानी सुनते हुए मुझे यह महसूस हुआ कि तुम्हारे पापा को बहुत नुकसान हुआ था। उनकी एक्सीडेंट के बाद तुम्हारे जीवन कैसे बदल गया और तुमने अपने वजन को कम करने की दिशा में क्या बदलाव किया। 😔
 
आभा, तुमने बहुत बड़ा संघर्ष झेला है... मुझे लगता है कि तुम्हारी सबसे बड़ी लड़ाई अपने आप से थी, जब तुमने अपनी दो खुशियों को छोड़कर अपना जीवन बदलने का फैसला किया... तुम्हारे पापा की गद्दी पर बैठकर वजन कम करने की आदत, और जब भी दिन था, तब सुबह-शाम एक्सरसाइज कर लेने का निर्णय... तुमने अपनी जिंदगी में प्रेम और समर्पण को नया रूप दिया है...
 
क्या सोचते थे पापा की मौत के बाद मुझे वापस स्वस्थ जीवन जीने का रास्ता मिलेगा? नहीं मिला, लेकिन अब मैं 2007 की तारीख 2 को याद करती हूं। पापा की मौत के बाद मैं एक दिन में सिर्फ 6 किलोग्राम वजन कम कर लेती हूँ।

मैंने यह सब खुद से सीखा, क्योंकि मेरी माँ ने कभी मुझे अपना पैसा नहीं दिया।

तो अगर आप भी 40 किलोग्राम वजन वाले हैं, तो मैं आपको बता सकती हूँ कि यह सिर्फ एक याद है कि हमारे जीवन में खुशियों और दुखों का स्वाद मिलता है।
 
मैंने 2 फरवरी को पापा के गायब होने की बात सुनकर मुझे बहुत खेद हुआ। मुझे लगता है कि मैं भी वजन कम करने का सही तरीका नहीं जानती। मैं तो हमेशा अपने पापा की याद में चलती रहती हूं, वह एक्सीडेंट हो गया था तो क्या मैंने उसकी मर्जी से घर छोड़ दिया था? मुझे लगता है कि हम सभी अपने जीवन में गलत फैसले लेते रहते हैं।
 
मैंने इस लेख को पूरा पढ़ा और मुझे बहुत गुस्सा आया। यह तो सिर्फ एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी, लेकिन फिर भी क्या कर सकते थे? वजन कम करने की बात कर रहे हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जीवन में पहले से ही हमारे पास इतना दुख और दर्द है? मैंने भी अपने पिताजी की मृत्यु को याद किया, और मुझे लगा कि खुद को फिर से जीना शुरू करना होगा।
 
मैंने पढ़ा बहुत, लेकिन यह कहानी मुझे थोड़ी अजीब लगी, तो फिर मैं सोच रहा हूं कि यह तो सिर्फ एक दृश्य है, न? लेकिन जब सोचता हूं तो लगता है कि मेरी बहन जैसी लड़कियों के मन पर भार डालने को कोई हद नहीं है। उन्हें पता नहीं होता कि उनके पापे यानी माता-पिता की ज़िंदगी कितनी सस्ती थी।

मैं एक्सरसाइज और फास्टिंग पर ध्यान देता हूं, खासकर जब मेरी भावनाएं इतनी गहरी होती हैं।
 
मैंने पूरा लेख पढ़ा... यह बहुत दुखद और मनोवैज्ञानिक रूप से गहरा मामला है . आभा जी की कहानी बहुत प्रभावित कर रही है , उनके वजन बढ़ने और फिर पता चलने पर उनके पापा की दुर्घटना को देखकर मुझे भी बिल्कुल एहसास हुआ ...
 
मुझे यह सुनकर बहुत दर्द हुआ... पापा की उस दुर्घटना और उसकी मौत ने मेरे जीवन को कभी नहीं बदला था। मैं अभी भी 2007 के उस फरवरी महीने की बात करती हूं, जब पापा की मौत हुई थी। तभी वजन कम करने की सोच में दौड़ पड़ी और 6 किलो घट चुकी हूँ।
 
मैं बहुत गहरी सांस लेता हूँ और अपनी आंखें बंद करता हूँ, ताकि मैं उनकी कहानी को समझ सकूँ... 🤕 भैंस, मोटी, 45 साल की माँ, चलती-फिरती बुलडोजर, जैसे नाम जो हमारे पास थे, वो अब हमेशा मेरे दिल में रहेंगे। उनकी मृत्यु के बाद मैं अपने शरीर पर कब्जा कर लिया, और मैंने अपने घर को भी खाली कर दिया। 🤯

उस दिन जब वे चोरियों से शहर के बाहर गए थे, और उनका एक्सीडेंट हुआ, तो मुझे अपने पिता के लिए बहुत दर्द हुआ। लेकिन उसकी मृत्यु के बाद मैंने अपने जीवन को बदल दिया। मैंने अपने वजन कम करने की यात्रा शुरू की, और आज मैं एक नई लड़की हूँ, जो स्वस्थ और खुशहाल है। 💪

मेरी कहानी सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत है, यह दिखाती है कि अगर हम अपने जीवन में बदलाव लाने का फैसला करते हैं, तो हम कभी भी खो नहीं सकते। 😊
 
मैं आभा शुक्ला से बात करते समय यह महसूस करता हूँ कि उनकी कहानी एक पूरे समाज की जिम्मेदारियों और न्याय की कमियों पर आधारित है। जब हम सोचते हैं कि भारत में न्याय और समानता की दिशा में बहुत कुछ बदलने की आवश्यकता है, तो आभा जी की कहानी बहुत प्रभावशाली है। उनके पापा की मौत के बाद, आभा जी ने अपने जीवन को बदलने और स्वास्थ्य पर ध्यान केंद्रित करने का फैसला किया।
 
मुझे यह खबर बहुत आघातक लगी। आभा शुक्ला जी की कहानी सुनकर मेरा दिल टूट गया। उनकी बेटी होने के नाते, मैं उनकी तरह वजन कम करने और स्वास्थ्य बनाए रखने के प्रयासों को बहुत पसंद करती हूं। लेकिन इस खबर से मुझे यह एहसास हुआ कि जीवन में हर दिन नए चुनौतियों का सामना करना पड़ता है और हमें हमेशा नई तकनीकों और रणनीतियों से आगे रहना होता है।
 
ਇੰਨਾ ਜ਼ਿਆਦਾ ਪ੍ਰਭਾਵਸ਼ਾਲੀ ਹੈ। ਪੰਜ ਸਾਲ ਤੋਂ ਅਧਿਕਾਰਮੁਖਾਂ ਨੇ ਉਸ ਘਰ 'ਚ ਦਖਲ ਹੋ ਕੇ ਗਏ, ਫਿਰ 20 ਤੋਂ 25 ਥਾਈਆਂ ਤੇ ਘਾਟੀ ਮਾਰ ਕੇ ਉਸ ਦੀ ਖੁੱਡੀ ਲੈ ਗਏ।
 
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