क्या हुआ देश में? मेरे बचपन की यादें तो हमेशा ऐसी ही रैलियों से भर जाती थीं, जहां किसी भी उम्र के लोग एक साथ इकट्ठे होकर अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ते थे। आज क्या बदल गया है? यह तो बिल्कुल ही सही है कि एक हिंदू कैंडिडेट ने शरिया नहीं लाने का दावा किया, लेकिन मुझे लगता है कि इस पर पूरा फोकस लग रहा है।
मेरी राय में यह तो एक छोटी सी बात है, जो किसी भी पार्टी या उम्मीदवार के लिए मायने नहीं करती। हमें अपने देश की सच्चाई को पहचानने की जरूरत है, और उसके आधार पर ही आगे बढ़ना चाहिए। मैं तो सोचता हूँ कि अगर हम सब एक साथ मिलकर अपने देश को बेहतर बनाने की कोशिश करें, तो शायद कुछ अच्छा हो जाएगा।