यूपी: 2 साल में 108300 लोग हुए लापता, केवल 9700 मामलों में ही पुलिस दिखी एक्टिव, हाईकोर्ट नाराज

उत्तर प्रदेश में लापता लोगों की बढ़ती संख्या पर अदालत ने चिंता जताई है. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रजिस्ट्री को जनहित याचिका दर्ज करने का निर्देश दिया है क्योंकि पिछले 2 साल में लगभग एक लाख आठ हजार तीनसौ लोग लापता हुए हैं लेकिन पुलिस ने केवल 9700 मामलों में ही कार्रवाई की.

हाईकोर्ट बेंच ने कहा, "हम इन लापता व्यक्तियों की शिकायतों पर अधिकारियों के रवैये से हैरान हैं. यहां अधिकारियों को तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए." पुलिस ने अपने सुस्त रवैये को लेकर अदालत में भी आलोचना की जा रही है.

जस्टिस अब्दुल मुईन और जस्टिस बबीता रानी की बेंच ने इस मामले की सुनवाई के दौरान प्रसाद परिवार की याचिका सुनी। उनके बेटे विक्रमा प्रसाद जुलाई 2024 में लापता हो गए थे. उन्होंने आरोप लगाया था कि पुलिस ने उनके बेटे को ढूंढने में दिलचस्पी नहीं दिखाई.

गृह विभाग के अपर मुख्य सचिव से अदालत ने एक हलफनामा मांगा। इस हलफनामे के अनुसार, पूरे राज्य में लगभग एक लाख आठ हजार तीनसौ लोगों की गुमशुदगी की शिकायतें दर्ज हुईं. लेकिन लापता व्यक्तियों को ढूंढने के लिए सिर्फ 9700 मामलों में ही कार्रवाई की.

इस पर अदालत ने पुलिस के रवैये से नाराजगी जताई और इस मामले को जनहित याचिका के रूप में दर्ज करने का निर्देश दिया। इस मामले की सुनवाई 5 फरवरी को सूचीबद्ध की गई है।
 
मुझे यह बात बहुत चिंतित करती है कि लापता लोगों के मामले में अदालत तेजी से कार्रवाई कर रही है 🤔। अगर पुलिस ने इतने लोगों को ढूंढने में सुस्ती दिखाई, तो यह हमारे समाज की गहरी समस्या है। लेकिन जैसा कि अदालत ने कहा, अधिकारियों को तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए। शायद इस मामले में पुलिस को अपने काम पर थोड़ा ध्यान देने की जरूरत है।
 
Wow 😮, यह बहुत चिंताजनक बात है कि इतने लोग लापता हो गए हैं और पुलिस की कार्रवाई भी देखकर हैरान होना पड़ रहा है। पुलिस का रवैया स्पष्ट नहीं है, क्या वे लापता व्यक्तियों को ढूंढने में ताकतवर हैं? 😕
 
पुलिस के पास इतनी जिम्मेदारी है लेकिन वे यह भी नहीं कर पा रहे कि लोग कहाँ रहते हैं और लापता हुए लोगों को ढूंढने में वो इतने सुस्त हैं। ये राज्य तो बहुत बड़ा है और लोग तो हर घर में अलग-अलग पते होते हैं। पुलिस को अपने काम की गुणवत्ता अच्छी करनी चाहिए तो ना तो इतने लोगों की संख्या में लापता रहने वालों को ढूंढ पाते।
 
ये तो बहुत बड़ा मुद्दा है, लापता लोगों की बढ़ती संख्या पर अदालत ने ध्यान दिया है और पुलिस को उनके शिकायतों पर अधिकारी होने चाहिए. यह अच्छा है कि अदालत ने इस मामले को जनहित याचिका के रूप में दर्ज करने का निर्देश दिया है, ताकि पुलिस जल्द से जल्द उनकी शिकायतों पर कार्रवाई कर सके।

मुझे लगता है कि यह पुलिस की गलती नहीं है, बल्कि उनको अपनी जिम्मेदारी को समझने की जरूरत है। अदालत ने भी बात कही है कि अधिकारियों को तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए, तो यह जरूरी है कि वे अपने काम में सुधार करें।
 
यह तो बहुत ही चिंताजनक बात है 🤕, क्योंकि लापता लोगों की बढ़ती संख्या पर अदालत ने पुलिस के रवैये से नाराजगी जताई है. यह देखकर मुझे बहुत गुस्सा हुआ था कि कैसे पुलिस ने एक लाख आठ हजार तीनसौ लोगों को ढूंढने में इतनी देर लगी।

मैं सोचता हूँ कि पुलिस को अपनी गड़बड़ी को समझाने का समय नहीं है, हमें उन्हें मदद करनी चाहिए 🤝, ताकि लापता लोगों को ढूंढने में कुछ सुधार हो सके।
 
लोगों की गुमशुदगी पर इतनी चिंता क्या जरूरी है? पुलिस तो ऐसे लोगों को ढूंढने में भी असमर्थ हैं जो अपने घर से बाहर निकलते हैं। लेकिन गुमशुदगी वाले लोगों को ढूंढना तो पुलिस का बहुत बड़ा काम है। यह देखकर अच्छा नहीं लगता कि अदालत ने अब भी कहा है कि पुलिस को कार्रवाई करनी चाहिए।
 
अगर पुलिस तुरंत लापता लोगों की तलाश करे तो इतनी कम लोगों को ढूंढकर मामले दर्ज करने की जरूरत नहीं थी, यह सोचो 🤔। ज्यादातर लोग लापता होने से पहले खुद को पता नहीं करते हैं और बाकी लोगों ने भी अपनी गुमशुदगी की शिकायतें दर्ज करने में दिलचस्पी नहीं दिखाई। यह पुलिस की कमजोरी है और अदालत को उनके सुस्त रवैये को लेकर सच्चाई बताने में मदद करना चाहिए 👮‍♂️
 
ये तो दंगबाद है, पुलिस की तरह से यारो बिचार हैं! अगर इतने लोग गुम हो गए तो उन्हें ढूंढना चाहिए, नहीं तो क्यों? कानून का काम करने वाले लोगों में नेतृत्व करने वाले भी नेत्रहीन लगते हैं।
 
अगर पुलिस अपने काम पर ध्यान नहीं देती तो यह एक बड़ा समस्या है 🤕. अगर लोगों की गुमशुदगी की शिकायतें दर्ज होती और उनको ढूंढने के लिए कार्रवाई होती तो यह अच्छा होता। लेकिन ये जानकारी नहीं है। पुलिस को अपने काम पर ध्यान देना चाहिए और लोगों की सुरक्षा का ध्यान रखना चाहिए।
 
न्यायपालिका तेज़ कदम उठानी चाहिए, लापता लोगों को ढूंढने के लिए समय पर कार्रवाई करनी चाहिए 🚨
 
मैंने पढ़ा यह तो बहुत शर्मिंदगी है पुलिस पर। जैसे लाख लोग गुम हुए तो बस 9700 मामलों में ही कार्रवाई की, यह तो नियंत्रण खोने का संकेत है। अदालत बिल्कुल सही कह रही है कि पुलिस अपने रवैये से हैरान होनी चाहिए। गुमशुदगी की शिकायतें बढ़ रही हैं तो पुलिस को तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए, नहीं तो यह मामला और भी जटिल हो सकता है।
 
अरे, यह तो बहुत बड़ा मुद्दा है! पुलिस वालों को तो इतना भार नहीं है, लेकिन जनहित याचिका दर्ज करने के बाद तो सब अलग हो जाता है 😅। यह तो लापता लोगों की माँग की बात है, लेकिन पुलिस वालों को सिर्फ अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर निकलने देना चाहिए ना। इसके लिए उन्हें तैयार होना चाहिए, न कि फंसना चाहिए।
 
ये तो बहुत बड़ा मुद्दा है 🤯। पुलिस ने इतनी गुमशुदगी की शिकायतें लेकर आए हैं लेकिन अभी तक कोई जवाब नहीं दिया है। यह तो सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती होगी। मुझे लगता है कि पुलिस को अपने काम पर फोकस करना चाहिए और इन लापता व्यक्तियों को ढूंढने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए।
 
मुझे लगता है कि पुलिस जो होना चाहिए वह कर रही है, लापता लोगों को ढूंढने में तेजी आ गयी चाहिए. रजिस्ट्री को जनहित याचिका दर्ज करने से यह अच्छी बात कही नहीं है लेकिन अगर पुलिस जैसी ठीक से काम नहीं कर रही है तो अदालत को ऐसा करने का निर्देश देना चाहिए।

कौन सा नियम है जब तक हम पुलिस व गृह विभाग के लोग जिम्मेदार नहीं मानेंगे तब तक ये समस्या नहीं हल हो सकती
 
मुझे लगता है कि पुलिस की हरकतें अच्छी नहीं हैं... उन्हें लोगों की जिंदगी को खतरे में डालने वाले मामलों पर ध्यान देना चाहिए... 👮‍♂️😒
 
मुझे यह तो बहुत चिंता का विषय है कि इतने लोग लापता हुए हैं और पुलिस ने अभी भी इनसे नहीं मिलने की कोशिश की? क्या ये लोग फंस गए, या कुछ और हो सकता है? मुझे लगता है कि पुलिस की जिम्मेदारी बढ़ गई है, हमें उम्मीद करनी चाहिए कि वे इन लोगों को ढूंढेंगे, लेकिन देखा गया है कि नहीं।
 
तो देखो, अदालत ने कहा है कि पुलिस क्यों इतनी धीमी है, फिर भी लापता व्यक्तियों को ढूंढने में 9700 से भी कम कार्रवाई की. यह बहुत अजीब है, पुलिस को तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए, नहीं तो लोगों को निश्चित रूप से गुमशुदगी का डर होगा. और अदालत ने कहा है कि पुलिस का रवैया बहुत अजीब है, तो फिर भी क्यों ऐसा कर रहे हैं? चिंताजनक है
 
अगर पुलिस ऐसे ही सुस्त रहती तो एक लाख आठ हजार तीनसौ लोग भी अपने परिवारों के साथ कभी नहीं मिलेंगे। इसका मतलब यह है कि पुलिस अभी तक गुमशुद व्यक्तियों को ढूंढने में असमर्थ है।

अगर अदालत ने पुलिस के रवैये से नाराजगी जताई तो इसका मतलब है कि अदालत भी पुलिस की चालाकी नहीं देख रही। यहां पर अदालत की बेंच ने आरोप लगाया था कि पुलिस विक्रमा प्रसाद को ढूंढने में दिलचस्पी नहीं दिखाई। लेकिन अब अदालत की बेंच ने यह ही कहने का साहस नहीं किया।

इस मामले में जानबूझकर पुलिस को सुस्त रहने का आरोप लगाया गया तो इसका मतलब है कि अदालत को यह पता भी है। लेकिन फिर भी अदालत ने इस पर कोई जवाब नहीं दिया।
 
अरे, यह बहुत चिंताजनक बात है कि उत्तर प्रदेश में लापता लोगों की बढ़ती संख्या पर अदालत ने ध्यान दिया है. यह साफ तौर पर पता चल रहा है कि पुलिस अपने जिम्मेदारियों को लेने में असफल हो रही है. क्या यह इतना आसान है कि जब भी कोई व्यक्ति गुमशुदगी का संदेह लगता है, तो पुलिस ने उसे अपनी खाली बंदूक में भरने का मौका दिया जाए?

हमारे देश में लापता लोगों की संख्या बढ़ रही है और अदालतें इस पर ध्यान नहीं देने वाली हैं. इसके पीछे एक बड़ा सवाल उठता है कि क्या हमारे पुलिस और सरकारें अपने लोगों की सुरक्षा को लेकर प्रासंगिक कदम उठा रही हैं या नहीं?
 
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