Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट का अदालतों को निर्देश- वकील का खर्च नहीं उठा सकता आरोपी तो दें कानूनी सहायता

सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों को निर्देश दिया है कि यदि आरोपी वकील का खर्च नहीं उठा सकता है, तो वे ट्रायल शुरू होने से पहले उन्हें कानूनी सहायता देने की पेशकश करें और उनका जवाब रिकॉर्ड करें।

इस आदेश के माध्यम से, सुप्रीम कोर्ट ने यह सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि आपराधिक मामलों की सुनवाई करने वाली ट्रायल अदालतें ऐसी स्थितियों का सामना करने पर भी आरोपी को कानूनी प्रतिनिधित्व के उनके अधिकार और अगर वे वकील का खर्च नहीं उठा सकते हैं तो कानूनी सहायता प्राप्त करने के हक के बारे में बताएं।

इस आदेश के अनुसार, गवाहों की जांच शुरू करने से पहले ट्रायल कोर्ट इस संबंध में आरोपी को दिए गए प्रस्ताव, उस प्रस्ताव पर आरोपी के जवाब और उसके बाद की गई कार्रवाई को अपने आदेशों में रिकॉर्ड करेगी।

इस आदेश को सावधानी से अपनाया जाना चाहिए और अमल में लाया जाना चाहिए, ताकि आरोपियों को उनके अधिकारों के प्रति सम्मान दिया जा सके।
 
अरे, यह आदेश बहुत ही महत्वपूर्ण है और इसका सामना करना चाहिए। ऐसा लगता है कि अदालतें अब बीमार वकीलों को भी विशेष ध्यान दे रही हैं 🤝। प्रस्ताव में आरोपियों के अधिकारों के बारे में जागरूकता फैलाने की जरूरत है, ताकि वे अपने अधिकारों को समझ सकें और उनका उपयोग कर सकें। इससे न्याय प्रणाली में सुधार हो सकता है और आरोपियों को भी सम्मान मिले।
 
अरे, यह बहुत ही महत्वपूर्ण आदेश है 🤔। कानूनी सहायता की बात करें, तो 2023 में हमने देखा था कि आरोपी वकीलों के लिए कितना खर्च होता है। और अब, सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश दिया है कि अगर आरोपी वकील इसका नहीं उठा सकता है, तो उन्हें पहले ट्रायल शुरू होने से पहले कानूनी सहायता मिलेगी।

लेकिन, मुझे लगता है कि यह आदेश थोड़ा कम था। 2020 में भारत में अदालतों की संख्या और आरोपियों की गिनती में बदलाव देखा गया था। ऐसे में हमें तय करना होगा कि इस आदेश को लागू करके हमारी न्यायपालिका किस तरह के प्रभावी हो सकती है।

चर्चा में आ रहे है कि आरोपी वकीलों के खर्च पर कैसे स्थिरता बनाई जाए। मुझे लगता है कि सरकार और न्यायपालिका के बीच मिलकर काम करना होगा। कुछ राज्यों में हमने देखा है कि अदालतें आरोपियों को फ्री लैंडिंग पर मिलने की पेशकश करती हैं।

लेकिन, ये आदेश सिर्फ एक शुरुआत है। अभी भी बहुत सारे आरोपी वकीलों का खर्च उठाने में दिक्कत होती है। इसलिए, हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि कानूनी सहायता प्रदान करने पर विचार किया जाए।

कुछ आंकड़े बताते हैं कि 2022 में भारत में अदालतों की संख्या में वृद्धि हुई थी, जिसमें लगभग 55,000 अदालतें शामिल थीं। और अगर हम गिनती करते हैं तो 1.5 करोड़ से अधिक मामले सामने आ रहे हैं।

इस तरह से, हमारी न्यायपालिका की चुनौतियों को समझने के लिए, यह आदेश एक महत्वपूर्ण कदम है।
 
ਆਪਣੀ ਜਨਤਾ ਲਈ ਕੁਝ ਵੱਡੇ ਧਿਰ ਹੋ ਗਏ ਹਨ, ਸੁਪਰੀਮ ਕੋਰਟ ਦਾ ਆਦੇਸ਼ ਲਗਭਗ ਹਰ ਕਿਸੇ ਵਿੱਚ ਖਿਡਾਈ ਪਾ ਰਿਹਾ ਹੈ, ਤਾਂ ਜੋ ਅਸੀਂ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਆਪਣੇ ਅਧਿਕਾਰਾਂ ਦੇ ਬਾਰੇ ਮੰਨਵੀ ਹੋਈਏ, ਲੇਕਿਨ ਇਸ ਆਦੇਸ਼ ਤੋਂ ਪੁਰਾਣੇ ਸਮਝੌਤੇ ਖਿਲਵਾਜ ਹੈ, ਕਿਉਂਕਿ ਅਸੀਂ ਜਨਤਾ ਦੇ ਪ੍ਰਤੀਨਿਧੀਆਂ ਦੇ ਸਮਾਨ ਹਾਂ, ਲੈਕਨ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਬਚਵੇ ਪੁੱਤਰਾਂ ਨੂੰ ਸਮਾਨ ਅਧਿਕਾਰ ਨਹੀਂ ਦਿੱਤੇ ਗਏ।
 
😊 इस आदेश से अदालतें निश्चित ही अपनी भूमिका और कर्तव्य को बेहतर ढंग से समझने में सफल होंगी, जैसे कि अन्य देशों में, जहां आरोपियों को भी वकील की मदद की पेशकश की जाती है। 🤝 लेकिन हमें यह ध्यान रखना होगा कि अगर ट्रायल शुरू होने से पहले आरोपी वकील का खर्च नहीं उठा सकता है, तो अदालत में उनकी आवाज़ भी मुश्किल से सुनी जाएगी। 😔 यह किसी भी तरह से न्याय प्रणाली को कमजोर नहीं बनाएगा, बल्कि हमें अपने देश के लिए एक नए रास्ते पर चलने का अवसर मिलेगा। 👍
 
अरे, यह आदेश तो बहुत ही महत्वपूर्ण है... परन्तु मुझे लगता है कि अभी भी बहुत सारे सवाल हैं। आरोपी वकील के खर्च के बारे में तो सरकार क्या कर रही है? यह तो उनके लिए एक बड़ा बोझ होगा। और अदालतों में कानूनी सहायता देने की पेशकश करने से पहले उन्हें आर्थिक रूप से स्थिर रहने का मौका नहीं दिया जा सकता... 😐

कुछ लोग कह रहे हैं कि यह आदेश तो उनके अधिकारों की रक्षा करता है, लेकिन मुझे लगता है कि इससे भी नए समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। जैसे कि अदालतें आरोपियों के खिलाफ मामलों को तेजी से देखने लगें, तो उनकी तरक्की पर ध्यान न दें। और फिर भी, कुछ लोग यहाँ तक कह रहे हैं कि अदालतें इन नए आदेशों का पालन करनी चाहिए... परन्तु हम उनसे पूछताछ करें, कि वे कैसे सुनिश्चित करेंगे कि आरोपियों को उनके अधिकारों के प्रति सम्मान दिया जाए? 🤔
 
मुझे लगता है की यह आदेश हमारे न्यायपालिका की भूमिका पर सवाल उठा रहा है। अगर अदालतें आरोपियों को वकील का खर्च नहीं उठा सकते हैं तो वे उनके अधिकारों का उल्लंघन कर रहे हैं। इससे हमारे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर भी सवाल उठेगा।

मुझे लगता है की हमें आरोपियों को वकील चुनने का अधिकार देना चाहिए, ताकि वे अपने मामलों को स्वयं सुलझा सकें। अगर वे ऐसा नहीं कर सकते हैं तो फिर अदालतें उनके मामले को खोलकर उन्हें न्याय दिलानी चाहिए। इस आदेश के अनुसार, आरोपियों को वकील का खर्च उठाने की जिम्मेदारी देने से हमने अपने न्यायपालिका की भूमिका को कमजोर कर दिया है।

क्या हमें यह मानना चाहिए कि अदालतें आरोपियों को वकील का खर्च उठाने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए? नहीं, मुझे लगता है कि नहीं।
 
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