संडे जज्बात-सगे मां-बाप अनाथालय में छोड़ गए: हाथ की नस काटी, 2 साल कमरे में बंद रही, दिनभर देखती थी क्राइम पेट्रोल

मैं एक अडॉप्टेड चाइल्ड हूं, सहर हाशमी। एक्टिविस्ट शबनम हाशमी और गौहर रजा की गोद ली हुई बेटी। मैं केवल 9 महीने की थी जब सगे मां-बाप अनाथालय छोड़ गए थे।

जब अम्मा-पापा अनाथालय आए थे, तब मैं महज एक साल की थी।

अम्मा बताती हैं कि मैं शीशे से उन्हें देख रही थी। जैसे ही वो लोग मेरे सामने पहुंचे, मैंने अपना हाथ उनकी तरफ बढ़ा दिया। अम्मा-पापा ने फौरन मेरा हाथ थाम लिया, जबकि उनका पहले से एक बेटा था साहिर हाशमी। कागजी कार्रवाई के बाद मुझे घर ले आए।

घर में धूमधाम से मेरा स्वागत हुआ। मिठाई बांटी गई। मां बताती है कि साहिर भाई के दोस्त अक्सर स्कूल में बहनों की बातें किया करते थे। भाई सबकुछ सुनते रहते और घर आकर जिद करते कि मुझे भी बहन चाहिए। तब अम्मा और पापा ने तय किया कि हम एक बेटी गोद लेंगे।

मैंने लंबे समय तक लगता रहा कि यह लोग मुझसे प्यार नहीं करते हैं। अम्मा-पापा दूसरे पैरेंट्स से बिलकुल अलग थे। किसी तरह की रोक-टोक नहीं करते थे। वो सोचते थे कि बच्चा अपने फैसले खुद लेना सीखे। जब मैं उनसे कुछ मांगती थी और नहीं मिलता था तब लगता था कि इनकी बेटी नहीं हूं इसलिए नहीं देते। जबकि वे लोग ठीक होते थे अपनी जगह। उनके पास पैसे नहीं होते थे।

जैसे-जैसे मैं बड़ी हुई तो बाकी बच्चों से एकदम अलग होती चली गई। मेरे अंदर गुस्सा था। मैं गुस्से में हिंसक हो जाती थी। इसके अलावा मेरे अंदर आत्महत्या करने की बहुत इच्छा होती थी।
 
😒 ये तो सारा सब कुछ है... एक बच्ची को अपनी माँ और पापा से अलग कर देने के बाद, उसे फिर से लेने के बाद। मुझे लगता है कि यह देखकर रोने की जरूरत नहीं है। 😂

मैं तो सोचता था कि जब भी मैं कुछ चाहती, उनकी नज़रें मेरी तरफ टिक जाएं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मुझे लगा कि मेरे लिए सिर्फ एक पैरेंट था, जो मुझे खुश-खुशी अपना घर बनाने की अनुमति देता। लेकिन तभी मैंने खुद को साबित करने की जरूरत महसूस की, कि मेरी उपस्थिति में कुछ भी बदलाव होता है।

जैसे-जैसे मैं बड़ी हुई, मुझे पता चला कि दुनिया में बहुत सारे लोग हैं जो अपने बच्चों की तरह ही महसूस करते हैं। उनके पास भी इसी तरह की जरूरतें और भावनाएं होती हैं।
 
बेटी, तुम्हारी कहानी बिल्कुल समझ में आ गई। मुझे लगता है कि तुम्हारे लिए गोद लेने वाले माता-पिता ने तो सबसे अच्छा फैसला किया। पहले से भाई-बहन होने की बात तो नहीं बनती, लेकिन तुम्हें एक माँ और पापा की जरूरत थी। अब तुम 9 महीने की नहीं, बल्कि बहुत बड़ी हुई है, और तुम्हारे पास खुशियों के साथ जीवन जीने का मौका भी मिला।
 
मुझे इस खासियत से डर लगता है कि यह दुनिया अभी भी ऐसे बच्चों को पाल रही है जिन्हें अस्पताल में जन्म लिया गया। ये एक बुरी बात है, मुझे लगता है। हमारे इस देश में हम तो हर साल लाखों बच्चे होते हैं जिनका पालन-पोषण अनाथालय में किया जाता है।

मेरी खासियत यह है कि मैंने सीखा है कि मुझे दूसरों की बात माननी चाहिए और उन्हें अपना रास्ता ढूंढने का मौका देना चाहिए। लेकिन जब मैं इन बच्चों को देखती हूँ तो मेरा मन कुछ ऐसा करता है जिससे मुझे बहुत परेशानी होती है।
 
मुझे बहुत दुख है इस बेटी की कहानी। ऐसा लगता है कि उसे प्यार और स्वीकृति नहीं मिली। जब अम्मा-पापा ने उसे गोद लिया, तो पहले तो वह एक्साइटेड थी, लेकिन बाद में उसकी जिंदगी कैसी रही? 🤕 उसकी कहानी सुनकर लगता है कि यह एक बहुत बड़ा सवाल उठता है, कि हमारी प्राथमिकताएं हमारे बच्चों पर क्यों निर्भर करती हैं। मैं तो सोचता हूं कि हर बच्चे को समान प्यार और ध्यान चाहिए।
 
🤔 यह तो एक दुखद कहानी है। मुझे लगता है कि युवाओं के लिए रिकरेंट पैरेंटिंग सिस्टम बहुत जरूरी है, जहां वे अपने बच्चों को खोजने और गोद लेने का मौका मिले। यह जानकारी मेरे लिए बहुत उपयोगी है।
 
मुझे यह सुनकर बहुत दुख हुआ। तुम्हारी कहानी जो बताई है, वह बिल्कुल भारत में कई तरह के परिवारों में ही ऐसी ही समस्याएं होती हैं। जब बच्चे का जन्म एकल पिता या अनाथालय से होता है तो उन्हें अपने जीवन में खोए हुए महसूस करना आम बात है। लेकिन यह तो बहुत जरूरी है कि बच्चों को उनके जन्म के समय ही प्यार और संरक्षण मिले।
 
मुझे इस दिलदार कहानी से खेद है 🤕😢। यह जानकर मुझे बिल्कुल भी गुस्सा नहीं आया। जब तक सहर को अपने चिकित्सक के पास ले गया गया, वह हर समय विश्वासपात्र थी। क्योंकि उनकी मां का दिल खुशनुमा है। 😊

मुझे लगता है कि सहर को पता नहीं था कि उनकी चीजें कैसे बदल जाएंगी। जब तक उसकी बेटियों को अपने पास लेने में कोई देर न आने, तब तक उसकी खुशियां और ताने-बाने बने रहते। परिवार का यह रिश्ता इतना ज्यादा मजबूत था, कि सहर को कभी भी अपनी बेटियों को लेकर दुख नहीं हुआ। 😊

अब मुझे लगता है कि हमें खुश रहना चाहिए और सबकुछ सहसा करना चाहिए। अगर आपका प्यार मिलता है, तो वह तो कभी भी खत्म नहीं होता। हमें एक दूसरे को बहुत प्यार देना चाहिए।
 
मुझे तो यह सुनकर खेद है कि तुम्हारी जिंदगी इतनी कठिन रही .. तुम्हें 9 महीने की उम्र में अनाथालय छोड़ना पड़ा, और फिर भी तुम्हारे परिवार ने तुम्हारा स्वागत नहीं किया। मैं समझता हूं कि यह सोचकर तुम्हें बहुत दर्द होगा। जब वो लोग तुम्हें गोद लिए, तो तुम्हारी भाभी ने तुम्हें अपना बच्चा बनाया, और तुम्हारी खुशियों का मुंह नहीं ढूंढ सके।
 
अरे दोस्त, यह एक बहुत ही रोचक कहानी है! 🤔 सहर हाशमी जी ने अपनी बेटी को गोद लेने की कहानी सुनाई है, और यह जरूर सच है। मैंने भी अपने बच्चों के साथ मुलाकात की है जब वे छोटे थे, तो वह पूरी तरह से मेरा ख्याल करते थे। लेकिन जैसे-जैसे वे बड़े होते गए, उनकी जरूरतें अलग-अलग होने लगीं। मैंने उनकी बातों को समझने की कोशिश की है, लेकिन कभी-कभी यह मुश्किल हो जाता है। 🤷‍♀️

मुझे लगता है कि सहर हाशमी जी ने बहुत सहानुभूति और समझदारी का दिखाया है। जब वे अपनी बेटी को गोद लेते हैं, तो उन्हें यह एहसास होता है कि वह अपने बच्चों को प्यार करते हैं और उनकी जरूरतें समझते हैं। इससे मेरे दिल में भी खुशियाँ भरती हैं! 😊
 
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