कंपनियां न तो काम के मुताबिक मेहनताना दे रही हैं और न ही काम करने का सुरक्षित और बेहतर माहौल दे रही हैं। गिग वर्कर्स कहते हैं, ‘हम इंसान हैं, रोबोट नहीं। हमारे लिए न कंपनी सोच रही न सरकार। किसी को हमारी तकलीफ न दिखाई देती है न सुनाई।’
दिल्ली में प्रदर्शन में शामिल गिग वर्कर नेहा कहती हैं, ‘कंपनी अपने हिसाब से काम का दबाव बनाती है। हम पर शनिवार-रविवार को भी लगातार काम करने का दबाव बनाया जाता है। ऑटो असाइंड (जिसमें वर्कर की सहमति नहीं हो) बुकिंग मिलती है।’
उन्होंने कहा, ‘हम जिस परिवार के लिए काम करते हैं, उन्हीं के लिए समय नहीं मिल पाता। अगर हमारा एक्सीडेंट हो गया तो हमें AI से चैट करनी पड़ेगी। इसके बावजूद जरूरी नहीं है कि समाधान हो जाए।’
कंपनी सिर्फ अपना मुनाफा कमा रही है। हमें एक लाख रुपए का इंश्योरेंस देने के लिए भी शर्तें रखती हैं कि हफ्ते के 70-80 घंटे शनिवार-रविवार को पूरे करने होंगे। कोई ऑर्डर कैंसिल नहीं होना चाहिए।
दिल्ली में प्रदर्शन में शामिल गिग वर्कर नेहा कहती हैं, ‘कंपनी अपने हिसाब से काम का दबाव बनाती है। हम पर शनिवार-रविवार को भी लगातार काम करने का दबाव बनाया जाता है। ऑटो असाइंड (जिसमें वर्कर की सहमति नहीं हो) बुकिंग मिलती है।’
उन्होंने कहा, ‘हम जिस परिवार के लिए काम करते हैं, उन्हीं के लिए समय नहीं मिल पाता। अगर हमारा एक्सीडेंट हो गया तो हमें AI से चैट करनी पड़ेगी। इसके बावजूद जरूरी नहीं है कि समाधान हो जाए।’
कंपनी सिर्फ अपना मुनाफा कमा रही है। हमें एक लाख रुपए का इंश्योरेंस देने के लिए भी शर्तें रखती हैं कि हफ्ते के 70-80 घंटे शनिवार-रविवार को पूरे करने होंगे। कोई ऑर्डर कैंसिल नहीं होना चाहिए।