6 महीने बाद भी पूर्व उपराष्ट्रपति धनखड़ ‘बेघर’: अफसर बोले- बंगला रेनोवेट करा रहे, मंत्री ने कहा- अभी बंगला अलॉट नहीं, वे पसंद तो करें

21 जुलाई 2025 को जगदीप धनखड़ ने अचानक उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा दिया। पद छोड़ने की वजह को लेकर सवाल उठे। इसके 42 दिन बाद सितंबर में धनखड़ ने सरकारी बंगला भी छोड़ दिया।

दोनों पक्षों की बातें और दावे एक-दूसरे से बिल्कुल अलग मिले। ऐसे में सवाल ये है कि आखिर सच कौन बोल रहा है। राज्य मंत्री तोखन साहू ने कहा है कि भले ही अब तक धनखड़ को बंगला नहीं मिला, लेकिन जैसे ही वह पसंद करें, तभी फौरन अलॉट कर दिया जाएगा।
 
अरे, तो जगदीप धनखड़ ने उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा देने का फैसला किया, और अब सवाल है कि क्या उनकी बात सच है? मैंने एक दोस्त को बताया था कि जगदीप जी को यह पद बहुत पसंद नहीं आया, लेकिन मुझे लगा कि वे थोड़े समय के लिए इसे संभालने के लिए तैयार होंगे।

लेकिन अब जब उन्होंने इस्तीफा देने का फैसला किया है, तो यह सवाल उठता है कि आखिर क्या उनकी बात सच है? मेरी राय में यह एक अच्छा फैसला साबित होगा, लेकिन फिर भी इस बारे में बहुत से सवाल और दावे हैं। किसने उन्हें पद छोड़ने के लिए कहा? और अब उनकी सरकारी बंगला कौन चला रहा है? ये सब सवाल एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और सच की खोज करना मुश्किल हो सकता है। 🤔
 
आपको पता है क्या? जगदीप धनखड़ ने उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा देने की बात कही थी, लेकिन अब तक कोई जवाब नहीं मिला तो यह तो बड़ी मुश्किल है। मैंने तो सोचा था कि वह सचमुच अपनी जगह छोड़ देंगे, लेकिन लगता है कि कुछ और बात हो सकती है। राज्य मंत्री तोखन साहू ने कहा कि अगर धनखड़ चाहते हैं तो फुरत मिल जाएगी, यह तो एक बड़ा दावा है! 🤔 मुझे लगता है कि सच्चाई तो पहले से ही बत गई होगी, लेकिन क्या हमें पता है? 😐
 
यह जानकर मुझे बहुत दुख हुआ 🤕 जगदीप धनखड़ को उनकी पद छोड़ने की वजह से इतना दर्द हुआ। हमें पता नहीं है कि वास्तव में क्यों उन्होंने ऐसा किया। यह सवाल मेरे दिल में एक बड़ा संदेश है। मैं जानता हूँ कि उनकी ज़िंदगी में बहुत कुछ हुआ होगा, जिसने उन्हें ऐसा निर्णय लेने पर मजबूर किया।

मुझे लगता है कि हमें उन्हें उनके फैसले के पीछे के कारणों को समझने की जरूरत है, ताकि हम उनकी बात सुन सकें। और शायद, अगर हम उनकी बात सुनेंगे, तो हमारा देश भी बदल जाएगा।

मैं उनके लिए अपने विचार निकालने में असमर्थ हूँ, लेकिन मैं यह कह सकता हूँ कि उन्होंने अपने फैसले से हमें कुछ सिखाया है।
 
मुझे लगता है कि अगर सरकार ने धनखड़ को बंगला मिलने का वादा नहीं किया, तो फिर उनका इस्तीफा स्वाभाविक था… या नहीं? 🤔 देखिए, यह सवाल ऐसी जटिल है कि अगर सरकार ने पूरी सच्चाई बताई, तो इसका मतलब यह भी हो सकता है कि धनखड़ को बंगला मिलने का वादा था, लेकिन उन्हें इसकी शर्तें मिलने नहीं दी। लेकिन अगर सरकार ने ऐसा वादा नहीं किया, तो फिर धनखड़ का इस्तीफा क्यों दिया?… जैसे ही स्थिति और सवालों का माध्यम से आगे बढ़ते हैं, यह समझने में अधिक समय लगेगा।
 
मैं समझता हूँ कि जगदीप धनखड़ ने उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा देने की बात कही थी, लेकिन 42 दिन बाद सरकारी बंगला भी छोड़ दिया। यह तो सवाल है कि सच कौन बोल रहा है? एक ओर तोखन साहू ने कहा है कि अगर धनखड़ पसंद करें तो अलॉट तुरंत मिल जाएगा, लेकिन ये तो थोड़ा अजीब लग रहा है। मैं समझता हूँ कि सरकारी पदों पर दाम और दंड का खेल बहुत ही स्पष्ट नहीं होता।
 
मुझे लगता है कि यह सब अचानक निर्णय से भरा हुआ है, जैसे कुछ व्यक्तिगत मुद्दों से लेकर सरकारी दबाव तक हर तरह का संदेश छुपाया गया है। जगदीप धनखड़ जी को उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा देने की वजह बताने की जरूरत नहीं है, खैर मुझे लगता है कि यह सब कुछ एक बड़े खेल का हिस्सा हो सकता है। और तोखन साहू जी के बारे में कहने पर, क्या वास्तव में उनके पास ऐसी शक्तियां हैं?
 
मुझे यह खबर बहुत अजीब लग रही है 🤔. जैसे ही जगदीप धनखड़ ने उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा दिया, लोगों को सवाल उठने लगे की क्यूँ? और अब वह सरकारी बंगला भी छोड़ रहे हैं... यह तो और भी अजीब है 🤷‍♂️. मुझे लगता है की ध्यान देने लायक नहीं है, लेकिन फिर भी सवाल उठने वाले हैं। राज्य मंत्री तोखन साहू ने कहा की अगर धनखड़ पसंद करें, तो अलॉट हो जाएगा। यह तो बहुत अजीब है... क्या सचमुच तो ऐसा होगा? 🤔
 
अरे, यह तो बहुत अजीब है कि जगदीप धनखड़ ने इतनी जल्दी उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया। मुझे लगता है कि सरकार के लिए यह एक अच्छा मौका हो सकता है कि उन्हें अपनी राजनीतिक जिंदगी को फिर से बनाने का मौका मिले। लेकिन, सवाल यह है कि क्या उनकी वजह सच्ची थी या नहीं। मुझे लगता है कि सरकार ने उन्हें बहुत अच्छी तरह से देखा होगा, इसलिए उनको इस्तीफा देने की वजह तो कुछ और होनी चाहिए। 🤔
 
🤔👀💸 जो भी कह रहे हैं कि जगदीप धनखड़ ने बंगला मिलाने के लिए कुछ कर दिया, तो शायद उनके पास कुछ चुराया गया है 🤑😏 यार, अगर उन्होंने सारा बंगला अलॉट नहीं कराया है, तो फिर क्या मिलेगा? 🤷‍♂️🎉
 
मैंने पहले सुना था कि अगर प्रधानमंत्री कोई भी पद छोड़कर घर चला जाए तो उसके बाद सरकार में कुछ बदलाव आ जाते हैं। अब यहीं ऐसा ही हुआ। राज्य मंत्री साहू ने कहा कि अगर उन्हें पैसे चाहिए तो फौरन दिया जाएगा, लेकिन मुझे लगता है कि सच्चाई और ईमानदारी कितनी महत्वपूर्ण होती है।
 
ਰਾਜ ਦੇ ਅੰਦਰ, ਕੋਈ ਵੀ ਸਿਆਸਤ ਹੁੰਦੀ ਹੈ, ਪਰ ਉਸ ਵਿੱਚ ਮਨੁੱਖ ਇਸ ਤਰ੍ਹਾਂ ਬੇ-ਕਸ਼ ਆਉਂਦਾ ਹੈ, ਜਿਸ ਨੂੰ ਪੈਸੇ ਦੀ ਵਿਰਲੀ ਖੁਰਾਕ ਮਿਲਣ 'ਤੇ ਹੀ ਆਪਣੇ ਅਹੁਦੇ ਛੱਡ ਗਏ ਜਾਂਦੇ ਹਨ।
 
मुझे लगता है कि जगदीप धनखड़ ने इस्तीफा देने की वजह से बिल्कुल भी नहीं सोचा। वह इतने बड़े पद पर आसीन होने के बाद, हमेशा विवाद में रहते रहें। उनका यह फैसला सिर्फ़ अपने नाम को आगे बढ़ाने का एक तरीका था, और अब देखें, चीजें और भी जटिल हो गईं। तोखन साहू जी की बातें मुझे थोड़ी अजीब लग रही हैं, अगर वह इतना सच्चा है तो फिर क्यों नहीं कहते कि धनखड़ ने पहले से ही अपना दिल पता कर लिया था। शायद सच कुछ और भी गहरा है। मुझे लगता है कि हमें ध्यान रखना चाहिए कि इस बात पर विश्वास कैसे किया जाए।
 
बिल्कुल हैरान हूँ, यह तो अचानक से हुआ है! 42 दिनों के बाद भी नहीं मिला और फिर इतनी जल्दी सरकारी बंगला छोड़ दिया? क्या सचमुच राज्य मंत्री ने सबकुछ खुलकर बताया? लगता है कि कुछ छिपा हुआ है, मुझे ऐसा लगता है। और तोखन साहू जी ने इतनी जल्दी अलॉट क्यों देने की बात कही, यह तो थोड़ा अजीब लग रहा है।
 
ਅरे, ਇਹ ਦੱਸਣ ਲਈ ਤਾਂ ਮੁਕਾਬਲਾ ਸੀ। ਜਗਦੀਪ ਧਨਖੜ ਦਾ ਉਪ-ਰਾਸ਼ਟਰਪਤੀ ਹੋਣ 'ਤੇ, ਅਰੇ ਕੀ ਗੱਲ ਕਰੋ? ਵਿਚਾਰ ਕਰੋ ਤਾਂ 42 ਦਿਨ ਪਹਿਲਾਂ ਉਸ ਦਾ ਬੰਗਲਾ ਖੱਟ ਵੀਜ਼ ਚਾਇਆ, ਪਰ ਕਿਤੇ ਨਹੀਂ ਮਿਲਿਆ! ਇਸ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਉਹ ਵੀ ਸਰਕਾਰੀ ਬੰਗਲਾ ਛੱਡ ਕੇ ਭੁੱਖੜ ਪਿੱਟੀ ਹੋ ਗਏ! 🤣

ਮੈਂ ਇਸ ਦੀ ਵਿਚਾਰ ਨਹੀਂ ਕਰ ਸਕਦਾ। ਉਹ ਅਸੀਂ ਜਲਦੀ 'ਤੇ ਬੰਗਲਾ ਮਿਲਣ ਦੀ ਆਪਣੀ ਕੋਸ਼ਿਸ਼ ਕਰ ਰਹੇ ਸਨ। ਜੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਮਿਲਿਆ, ਤਾਂ ਸਭ ਚੀਕੋਲਾ ਪਰਦੇਸੀ ਬਣ ਗਏ। ਅਰੇ, ਉਹ ਬਦਮਾਸ਼ ਹੈ! 😜
 
मुझे लगता है कि इस सबको देखना आसान नहीं है। तो खत्म होने वाला नौकरी, लेकिन बाकी क्या? सरकार को ऐसे में कौन सा फैसला करना पड़ता है? राज्य मंत्री जी ने कहा है कि अगर धनखड़ पसंद करें, तो अलॉट लगा दिया जाएगा, लेकिन अगर नहीं, तो? यह सवाल तो जरूरी है, क्या सरकार के पास धनखड़ को चुनने का इस्तेमाल करने का अधिकार है? मुझे लगता है कि सच्चाई खोजने के लिए हमें धैर्य रखना पड़ेगा।
 
आजकल उपराष्ट्रपति पद पर पद छोड़ने के मामले में बहुत सारे सवाल उठ रहे हैं। मेरी राय में यह एक बड़ा मुद्दा है कि अगर सरकार ने तोखन साहू जी को बंगला अलॉट करने की आशा थी, तो फिर क्यों उन्हें 42 दिनों तक इंतजार करना पड़ा। यह एक बड़ा सवाल है और इसका जवाब देना जरूरी है। अगर सरकार ने सच्चाई को देखने की कोशिश नहीं की, तो यह एक बुरा संकेत है कि हमारी प्रशासनिक प्रणाली में कुछ गड़बड़ी हो सकती है।
 
अगर जगदीप धनखड़ ने उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा देने का फैसला किया, तो इसके पीछे शायद एक बड़ा और गहरा मुद्दा ही होगा। सरकार की हरकतें अक्सर जटिल होती हैं और कई अलग-अलग स्ट्रेटजीज़ के साथ उनका सामना करना पड़ता है। अगर राज्य मंत्री तोखन साहू ने कहा है कि धनखड़ को बंगला मिल गया, लेकिन फिर भी उन्हें अलॉट नहीं दिया गया, तो इसका मतलब यह हो सकता है कि सरकार की नीतियाँ और प्रक्रियाएँ ज्याद़ा ही जटिल हैं। हमें अभी भी ध्यान रखना चाहिए कि सच्चाई कैसे उजागर होती है, यह देखने के लिए हमें थोड़ी और मेहनत करनी पड़ेगी।
 
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